चंदौली, 11 सितंबर 2026। धान की फसल में इन दिनों जीवाणु झुलसा, झोंका (ब्लास्ट) और शीथ ब्लाइट जैसे रोगों का प्रकोप बढ़ने की संभावना को देखते हुए कृषि विभाग ने किसानों को सतर्क किया है। जिला कृषि रक्षा अधिकारी ने किसानों को समय रहते फसल की निगरानी करने और रोग के लक्षण दिखाई देने पर निर्धारित उपचार अपनाने की सलाह दी है।जीवाणु झुलसा रोग की पहचान कृषि विभाग के अनुसार जीवाणु झुलसा रोग में धान की पत्तियों पर लहरदार पीले-सफेद या सुनहरे पीले रंग की सीमांत परिगलन दिखाई देती है। पत्तियां सिरे से पीछे की ओर सूखने और मुड़ने लगती हैं। सुबह के समय नए घावों पर दूधिया अथवा अपारदर्शी ओस की बूंद जैसी जीवाणु रिसाव की बूंदें दिखाई दे सकती हैं। गंभीर प्रकोप होने पर पत्तियां तेजी से सूख जाती हैं। रोकथाम के लिए स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट + टेट्रासाइक्लिन 30 ग्राम तथा कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 1.50 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव की सलाह दी गई है। गर्भावस्था के दौरान म्यूरेट ऑफ पोटाश 6 ग्राम/लीटर, जिंक उर्वरक 4 ग्राम/लीटर और एलीमेंटल सल्फर 6 ग्राम/लीटर का छिड़काव करने को कहा गया है। हवा और बारिश के बाद लक्षण दिखाई देने पर सात दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव दोहराने की सलाह दी गई है। ब्लास्ट रोग से भी रहें सावधान,झोंका यानी ब्लास्ट रोग में पौधे के ऊपरी भाग और पत्तियों पर आंख या नाव के आकार के भूरे धब्बे बनते हैं। इन धब्बों का केंद्र राख जैसा सफेद या भूरा तथा किनारे गहरे कत्थई रंग के होते हैं। संक्रमण अधिक होने पर पत्तियां पूरी तरह सूख सकती हैं। रोग की रोकथाम के लिए कार्बेण्डाजिम 50 प्रतिशत डब्ल्यूपी की 500 ग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने की सलाह दी गई है। शीथ ब्लाइट में भी सावधानी जरूरी,शीथ ब्लाइट अथवा तना झुलसा रोग अधिक आर्द्रता, गर्म तापमान और घने पौधों वाले खेतों में तेजी से फैल सकता है। इसमें पत्तियों पर भूरे धब्बे बनते हैं, जो बढ़कर लंबे बैंड का रूप ले लेते हैं। इससे पौधे कमजोर होकर सूखने लगते हैं और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसके नियंत्रण के लिए बुआई के 30 दिन बाद 2.5 किलोग्राम स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस को 50 किलोग्राम सड़ी गोबर की खाद या रेत में मिलाकर प्रति हेक्टेयर खेत में डालने की सलाह दी गई है। आवश्यकता पड़ने पर बुआई के 45 दिन बाद 10-10 दिन के अंतराल पर पत्तियों पर इसका छिड़काव जारी रखने को कहा गया है। इसके विकल्प के रूप में प्रोपिकोनाजोल 25 प्रतिशत ईसी अथवा अजोक्सीस्ट्रोबिन 7.1 प्रतिशत + प्रोपिकोनाजोल 11.9 प्रतिशत एसई की 500 ग्राम मात्रा को 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करने की सलाह दी गई है। कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे नियमित रूप से धान की फसल की निगरानी करें और रोग के शुरुआती लक्षण दिखाई देते ही कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार नियंत्रण उपाय अपनाएं, ताकि फसल को नुकसान से बचाया जा सके।

